नई दिल्ली । केन्द्र सरकार मृदा स्वास्थ्य में सुधार और रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने के उद्देश्य से प्रधानमंत्री कार्यक्रम – मदर अर्थ के पुनर्स्थापन, जागरूकता सृजन, पोषण एवं सुधार (PM-PRANAM) के माध्यम से संतुलित उर्वरक उपयोग और सतत कृषि को बढ़ावा देने के प्रयास तेज कर रही है। इसके साथ ही जैविक खेती, प्राकृतिक खेती और सटीक पोषक तत्व प्रबंधन का भी विस्तार किया जा रहा है।
PM-PRANAM योजना, जिसे आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (CCEA) ने 28 जून, 2023 को मंजूरी दी थी, वर्ष 2023-24 से 2025-26 की अवधि के लिए लागू की जा रही है। इसका उद्देश्य राज्यों और केन्द्रशासित प्रदेशों को यूरिया, डाइ-अमोनियम फॉस्फेट (DAP), NPK और म्यूरिएट ऑफ पोटाश (MOP) जैसे रासायनिक उर्वरकों की खपत कम करने के लिए प्रोत्साहित करना है। इसके लिए संतुलित पोषक तत्व उपयोग, वैकल्पिक उर्वरकों, जैविक खेती और संसाधन संरक्षण तकनीकों को बढ़ावा दिया जा रहा है।
यह योजना उन राज्यों और केन्द्रशासित प्रदेशों को वित्तीय प्रोत्साहन प्रदान करती है जो पिछले तीन वित्तीय वर्षों की औसत खपत की तुलना में रासायनिक उर्वरकों की खपत में कमी लाते हैं। प्रोत्साहन राशि उर्वरक सब्सिडी में हुई बचत का 50 फीसदी होती है, जिसमें से 95 फीसदी संबंधित राज्य या केन्द्रशासित प्रदेश को दिया जाता है, जबकि 5 फीसदी भारत सरकार अपने पास रखती है। राज्य के हिस्से में से 65 फीसदी राशि पूंजीगत व्यय परियोजनाओं, विशेष रूप से केन्द्र प्रायोजित योजनाओं के अंतर्गत, उपयोग की जानी है, जबकि शेष 30 फीसदी राशि सूचना, शिक्षा और संचार (IEC) अभियानों जैसी गतिविधियों पर खर्च की जा सकती है।
Ministry of Chemicals and Fertilizers के उर्वरक विभाग के अनुसार, पाँच राज्यों और केन्द्रशासित प्रदेशों – दादरा और नगर हवेली, दिल्ली, गोवा, मणिपुर और मिजोरम – ने वर्ष 2025-26 के दौरान पिछले तीन वित्तीय वर्षों की औसत खपत की तुलना में रासायनिक उर्वरकों की खपत में कुल 0.18 लाख मीट्रिक टन की कमी दर्ज की है। हालांकि, योजना के तहत प्रोत्साहन राशि का वितरण अभी तक नहीं किया गया है।
PM-PRANAM के पूरक के रूप में, सरकार ने किसानों को प्रिसिजन फार्मिंग तकनीकों का प्रशिक्षण देने, संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन को बढ़ावा देने और प्रमाणित जैविक खाद के बड़े पैमाने पर उत्पादन एवं उपयोग को प्रोत्साहित करने के लिए कई पहलें शुरू की हैं।
जैविक खेती को राज्यों और केन्द्रशासित प्रदेशों में परंपरागत कृषि विकास योजना (PKVY) तथा पूर्वोत्तर राज्यों में मिशन ऑर्गेनिक वैल्यू चेन डेवलपमेंट फॉर नॉर्थ ईस्टर्न रीजन (MOVCDNER) के माध्यम से बढ़ावा दिया जा रहा है। वर्ष 2015-16 में शुरू की गई ये दोनों योजनाएँ उत्पादन, प्रसंस्करण, प्रमाणन और विपणन तक संपूर्ण सहायता प्रदान करती हैं तथा विशेष रूप से छोटे और सीमांत किसानों के बीच जैविक खेती क्लस्टर बनाने को प्रोत्साहित करती हैं।
PKVY के तहत किसानों को तीन वर्षों में प्रति हैक्टर 31,500 रुपये की वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है, जिसमें जैविक आदानों के लिए प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) के माध्यम से 15,000 रुपये प्रति हैक्टर शामिल हैं। 30 जून 2026 तक इस योजना के अंतर्गत 18.93 लाख हैक्टर क्षेत्र को शामिल किया गया है, जिससे 33.63 लाख किसान लाभान्वित हुए हैं। केन्द्र सरकार ने अपनी हिस्सेदारी के रूप में 2,811.36 करोड़ रुपये जारी किए हैं।
MOVCDNER योजना के तहत किसान उत्पादक संगठनों (FPOs) के गठन और जैविक खेती को समर्थन देने के लिए तीन वर्षों में प्रति हैक्टर 46,500 रुपये की सहायता प्रदान की जाती है। किसानों को जैविक आदानों के लिए प्रति हैक्टर 32,500 रुपये मिलते हैं, जिनमें DBT के माध्यम से 15,000 रुपये शामिल हैं। योजना शुरू होने के बाद से 2.36 लाख हैक्टर क्षेत्र को जैविक खेती के अंतर्गत लाया गया है, जिससे 2.74 लाख किसान लाभान्वित हुए हैं। केंद्र सरकार ने इसके लिए 1,548.62 करोड़ रुपये जारी किए हैं।
सरकार राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन (NMNF) भी लागू कर रही है, जिसे 25 नवंबर, 2024 को शुरू किया गया था। इसका उद्देश्य पशुपालन, विविध फसल प्रणाली और पारंपरिक भारतीय कृषि पद्धतियों के साथ एकीकृत रसायन-मुक्त खेती को बढ़ावा देना है। मिशन का कुल वित्तीय परिव्यय 2,481 करोड़ रुपये है, जिसमें केन्द्र का हिस्सा 1,584 करोड़ रुपये और राज्यों का हिस्सा 897 करोड़ रुपये है।
इस मिशन के तहत प्राकृतिक खेती अपनाने वाले किसानों को दो वर्षों तक प्रति एकड़ प्रति वर्ष 4,000 रुपये का उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (Output Based Incentive) दिया जाता है, जो प्रति किसान एक एकड़ तक सीमित है।
वर्ष 2025-26 के दौरान मिशन के अंतर्गत 18,893 क्लस्टरों का गठन किया गया, जो 10.32 लाख हैक्टर क्षेत्र में फैले हैं और जिनसे 20.93 लाख किसान जुड़े हैं। मिशन के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए 33,257 कृषि सखियों और सामुदायिक संसाधन व्यक्तियों (CRPs) को प्रशिक्षित किया गया, जबकि देशभर में 7,601 बायो-इनपुट रिसोर्स सेंटर (BRCs) स्थापित किए गए।
विभाग के अनुसार, वित्तीय वर्ष के दौरान Natural Farming संबंधी जागरूकता कार्यक्रमों से 33.89 लाख किसान जुड़े। इसके अतिरिक्त 18.13 लाख मृदा नमूने एकत्र किए गए तथा आवंटित 725 करोड़ रुपये में से 599.68 करोड़ रुपये का उपयोग किया गया। प्राकृतिक खेती प्रमाणन प्रणाली (NFCS) के अंतर्गत 22.47 लाख से अधिक किसानों का पंजीकरण किया गया है, जिनमें से 14.43 लाख से अधिक किसानों को प्रमाणित किया जा चुका है।
सटीक पोषक तत्व प्रबंधन को बढ़ावा देने के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने 14 कृषि-परिस्थितिक क्षेत्रों को कवर करने वाली 50 फसलों के लिए ड्रिप फर्टिगेशन अनुसूचियाँ विकसित की हैं। इन्हें कृषि विज्ञान केंद्रों (KVKs), फ्रंटलाइन प्रदर्शनों, क्षेत्रीय प्रदर्शनों और किसान प्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से प्रसारित किया जा रहा है, ताकि किसान पोषक तत्वों के उपयोग का अनुकूलन कर सकें और फसल उत्पादकता बढ़ा सकें।
ICAR ने फार्म यार्ड मैन्योर (FYM), फॉस्फोकम्पोस्ट, वर्मी कम्पोस्ट, जैव-संवर्धित कम्पोस्ट, नगर ठोस अपशिष्ट कम्पोस्ट और समृद्ध किण्वित जैविक खाद जैसे जैविक पोषक स्रोतों के उपयोग को भी मानकीकृत और प्रोत्साहित किया है। इसके लिए प्रदर्शन, जागरूकता अभियान, प्रशिक्षण कार्यक्रम और मीडिया प्रचार किए जा रहे हैं।
विभाग ने कहा कि PM-PRANAM, जैविक खेती योजनाओं, राष्ट्रीय Natural Farming मिशन और प्रिसीजन न्यूट्रिएंट मैनेजमेंट पहलों का संयुक्त क्रियान्वयन मृदा स्वास्थ्य में सुधार, रासायनिक उर्वरकों पर अत्यधिक निर्भरता में कमी, पर्यावरण-अनुकूल कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देने तथा दीर्घकालिक कृषि उत्पादकता बढ़ाने के उद्देश्य से किया जा रहा है।
यह जानकारी Minister of State for Chemicals and Fertilizers अनुप्रिया पटेल ने मंगलवार को राज्यसभा में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में दी।
(Input from DD News)
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