भारत में वर्षा आधारित कृषि, जो देश के कुल शुद्ध बोए गए क्षेत्र का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा है, देश की कृषि अर्थव्यवस्था की आधारशिला बनी हुई है और कुल खाद्य उत्पादन में लगभग 40 प्रतिशत योगदान देती है। इसकी महत्वपूर्ण भूमिका को देखते हुए प्राकृतिक संसाधनों का सतत प्रबंधन तथा सुदृढ़ वर्षा आधारित कृषि प्रणालियों का व्यवस्थित विकास करना जिससे बढ़ती खाद्यान्न मांग को पूरा करने में एक सतत दिशा मिले।
इसी संदर्भ में, सरकार ने वर्ष 2014-15 में राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्य योजना के अंतर्गत राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन (NMSA) की शुरुआत की। साथ ही वर्ष 2018-19 से NMSA को “हरित क्रांति-कृषोन्नति योजना” की अम्ब्रेला योजना के अंतर्गत एक उप-मिशन के रूप में संचालित किया गया। आगे चलकर वर्ष 2022-23 से संस्थागत पुनर्गठन के तहत इसे प्रधानमंत्री राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (PMRKVY) की अम्ब्रेला योजना में शामिल किया गया, जो सतत एवं जलवायु-लचीली कृषि के विकास हेतु एक समेकित दृष्टिकोण को दर्शाता है।
NMSA के अंतर्गत जलवायु-लचीली कृषि हेतु समेकित नीतिगत हस्तक्षेप
NMSA लक्षित एवं समेकित हस्तक्षेपों के माध्यम से जलवायु-लचीली कृषि को बढ़ावा देता है। यह जल उपयोग दक्षता में सुधार, मृदा स्वास्थ्य को सुदृढ़ करने तथा जलवायु अनुकूल कृषि प्रणाली को मजबूत बनाकर सतत कृषि विकास की मजबूत आधारशिला प्रदान करता है।
NMSA के अंतर्गत प्रमुख हस्तक्षेपों में वर्षा आधारित क्षेत्र विकास (Rainfed Area Development - RAD) घटक शामिल है, जो विविधीकृत एवं जोखिम-प्रतिरोधी कृषि के लिए एकीकृत कृषि प्रणाली को प्रोत्साहित करता है। वहीं “पर ड्रॉप मोर क्रॉप” पहल सूक्ष्म सिंचाई को बढ़ावा देकर जल उपयोग दक्षता में सुधार करती है।
इन प्रयासों को मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन घटक द्वारा और अधिक सशक्त बनाया जाता है, जिसे मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना का समर्थन प्राप्त है। यह योजना संतुलित पोषक तत्वों के उपयोग को बढ़ावा देने तथा दीर्घकालिक मृदा उर्वरता बनाए रखने में सहायक है।
वर्षा आधारित क्षेत्र विकास के माध्यम से एकीकृत कृषि प्रणाली को सुदृढ़ बनाना
केन्द्रीय सहायता एवं कवरेज
योजना की शुरुआत से अब तक 2,119.84 करोड़ रुपये की केंद्रीय सहायता प्रदान की गई।
8.50 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को कवर किया गया तथा 14.35 लाख किसानों को लाभ मिला।
क्षमता निर्माण हेतु वित्तीय सहायता
एकीकृत कृषि प्रणाली (IFS) के प्रशिक्षण एवं अपनाने के लिए प्रति क्लस्टर 2.10 लाख रुपये की सहायता।
प्रदर्शन एवं किसान प्रशिक्षण (2024-25)
4,416 प्रदर्शन कार्यक्रम आयोजित किया गया।
कृषि विज्ञान केंद्रों के माध्यम से 96,015 किसानों को प्रशिक्षण प्रदान किया गया।
वित्त वर्ष 2025-26 में वर्षा आधारित क्षेत्र विकास के कार्यान्वयन हेतु राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को 343.86 करोड़ रुपये आवंटित किए गए, जिसके अंतर्गत 96,013 किसानों को प्रशिक्षण प्रदान किया गया।
राष्ट्रीय वर्षा आधारित क्षेत्र प्राधिकरण
राष्ट्रीय वर्षा आधारित क्षेत्र प्राधिकरण देश की शुष्क भूमि एवं वर्षा आधारित कृषि के व्यवस्थित उन्नयन और प्रबंधन के लिए ज्ञान आधारित सुझाव प्रदान करने वाली एक विशेषज्ञ संस्था के रूप में कार्य करता है। इसका मुख्य उद्देश्य ज्ञान-आधारित हस्तक्षेपों को बढ़ावा देना तथा विभिन्न एजेंसियों के साथ प्रभावी समन्वय स्थापित कर वर्षा आधारित कृषि को प्रोत्साहित करना है।
सूक्ष्म सिंचाई तकनीकों के माध्यम से जल उपयोग दक्षता में सुधार
“पर ड्रॉप मोर क्रॉप” (PDMC) पहल का उद्देश्य सटीक सिंचाई (Precision Irrigation) तथा अन्य जल संरक्षण तकनीकों को बढ़ावा देकर जल उपयोग दक्षता में सुधार करना है। सूक्ष्म सिंचाई प्रणालियों के विस्तार के लिए लाभार्थियों को सब्सिडी प्रदान की जाती है।
पीडीएमसी मुख्य रूप से खेत स्तर पर जल के कुशल उपयोग को बढ़ाने पर केंद्रित है, विशेषकर ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई तकनीकों के माध्यम से।
· ड्रिप सिंचाई में लेटरल पाइपों से जुड़े इमिटर्स के माध्यम से पौधों की जड़ क्षेत्र तक लक्षित रूप से पानी पहुँचाया जाता है, जिससे पानी की बर्बादी कम होती है और संसाधनों का सर्वोत्तम उपयोग सुनिश्चित होता है।
· स्प्रिंकलर सिंचाई में पाइपों और नोजल के नेटवर्क के माध्यम से दबाव के साथ पानी का छिड़काव किया जाता है, जो वर्षा जैसी स्थिति उत्पन्न कर खेत में समान रूप से सिंचाई सुनिश्चित करता है।
वर्ष 2015-16 से लागू इस योजना के अंतर्गत अब तक लगभग 109 लाख हैक्टर क्षेत्र को कवर किया जा चुका है तथा 26,325 करोड़ रुपये की केंद्रीय सहायता जारी की गई है, जिससे जल उपयोग दक्षता में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। इसके अतिरिक्त, सरकार ने वर्ष 2025-26 से 2029-30 की पाँच वर्षीय अवधि के दौरान 100 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को सूक्ष्म सिंचाई के अंतर्गत लाने का लक्ष्य निर्धारित किया है। इन लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए “पर ड्रॉप मोर क्रॉप” योजना के माध्यम से प्रतिवर्ष कम-से-कम 20 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को सूक्ष्म सिंचाई के अंतर्गत लाना आवश्यक होगा।
मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन: एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन के माध्यम से मृदा स्वास्थ्य एवं उत्पादकता में सुधार
मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन (Soil Health Management - SHM) स्थान एवं फसल-विशिष्ट सतत मृदा प्रबंधन पद्धतियों को बढ़ावा देता है, जिनमें अवशेष प्रबंधन तथा जैविक खेती शामिल हैं। यह मृदा उर्वरता के व्यवस्थित मानचित्रण, सूक्ष्म एवं स्थूल पोषक तत्वों के संतुलित उपयोग तथा उपयुक्त भूमि उपयोग पद्धतियों को प्रोत्साहित करता है।
इसके अतिरिक्त, SHM उर्वरकों के विवेकपूर्ण उपयोग तथा मृदा अपरदन एवं भूमि क्षरण को कम करने के उपायों पर भी बल देता है, जिससे दीर्घकालिक मृदा स्वास्थ्य और उत्पादकता सुनिश्चित हो सके।
मृदा स्वास्थ्य कार्ड (SHC) योजना: वैज्ञानिक जानकारी को किसान परामर्श में बदलना
वर्ष 2015 में शुरू की गई मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना, NMSA के अंतर्गत किसानों के लिए प्रमुख परामर्श साधन के रूप में कार्य करती है।
वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान कुल 97.53 लाख मृदा नमूने एकत्र किए गए, जिनमें से 92.87 लाख नमूनों का परीक्षण किया गया। फरवरी 2026 तक कुल मिलाकर 25.79 करोड़ मृदा स्वास्थ्य कार्ड तैयार किए जा चुके हैं।
ये कार्ड किसानों को फसल-विशिष्ट पोषक तत्व संबंधी सिफारिशें प्रदान करते हैं, जिससे वे उर्वरकों का संतुलित एवं वैज्ञानिक उपयोग कर सकें तथा मृदा स्वास्थ्य में सुधार ला सकें।
मृदा स्वास्थ्य कार्ड (SHCs)
· किसानों को 25.79 करोड़ मृदा स्वास्थ्य कार्ड (Soil Health Cards - SHCs) वितरित किए गए।
· इससे बेहतर मृदा प्रबंधन और उर्वरकों के संतुलित उपयोग को बढ़ावा मिला है।
वर्ष 2025 में नीति आयोग द्वारा किए गए एक मूल्यांकन के आधार पर इस योजना ने पोषक तत्वों के असंतुलन को सुधारने में योगदान दिया है, विशेषकर यूरिया के अत्यधिक उपयोग को कम करने में, तथा कृषि उत्पादकता में भी सुधार हुआ है। इसने एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन के व्यापक उद्देश्यों को भी समर्थन प्रदान किया है। उल्लेखनीय रूप से, सर्वेक्षण में शामिल 68.5 प्रतिशत किसानों ने अनुशंसित पद्धतियों को अपनाने के बाद मृदा स्वास्थ्य में महत्वपूर्ण सुधार की जानकारी दी, जबकि 25.7 प्रतिशत किसानों ने मामूली सुधार देखा।
मृदा उर्वरता मानचित्रों के माध्यम से किसानों की निर्णय क्षमता को सुदृढ़ बनाना
· भारतीय मृदा एवं भूमि उपयोग सर्वेक्षण (Soil and Land Use Survey of India - SLUSI) को ग्राम स्तर पर मृदा उर्वरता मानचित्र तैयार करने का दायित्व सौंपा गया है, ताकि खसरा स्तर पर पोषक तत्वों की स्थिति में क्षेत्रीय भिन्नताओं का निर्धारण किया जा सके। यह कार्य देशभर में पहले से विकसित जिला स्तरीय मानचित्रों के आधार पर किया जा रहा है।
· इस पहल के अंतर्गत 6,954 चयनित मॉडल गांवों में मृदा उर्वरता मानचित्रण किया गया है, ताकि किसानों को खेत स्तर पर क्षेत्र-विशिष्ट पोषक तत्व संबंधी जानकारी उपलब्ध कराई जा सके और उर्वरकों के संतुलित उपयोग को बढ़ावा मिले।
· इन मानचित्रों को गांवों में सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित किया जाता है, जिससे जागरूकता बढ़े और पोषक तत्व प्रबंधन संबंधी निर्णय लेने में किसानों को सहायता मिले। अब तक 2,023 मॉडल गांवों में मृदा उर्वरता मानचित्रण पूरा किया जा चुका है।
आईसीएआर-नेतृत्व वाली अनुसंधान प्रणालियों के माध्यम से कृषि लचीलापन को सुदृढ़ बनाना
· भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने वर्ष 2011 में “जलवायु अनुकूल कृषि पर राष्ट्रीय नवाचार” (National Innovations on Climate Resilient Agriculture - NICRA) नामक प्रमुख कार्यक्रम शुरू किया था, जिसका उद्देश्य जलवायु अनुकूल कृषि तकनीकों का विकास एवं प्रसार करना है।
· NICRA ने क्षमता निर्माण कार्यक्रमों तथा क्षेत्र-विशिष्ट जलवायु अनुकूल तकनीकों के प्रदर्शन के माध्यम से किसानों एवं हितधारकों की जलवायु परिवर्तन अनुकूलन एवं शमन क्षमता विकसित करने में NMSA को महत्वपूर्ण योगदान दिया है। यह पहल सूखा, बाढ़ एवं हीटवेव जैसी चरम मौसम घटनाओं का सामना करने हेतु कृषि प्रणालियों की अनुकूलन क्षमता बढ़ाने के लिए अल्पकालिक एवं दीर्घकालिक अनुसंधान को समर्थन प्रदान करती है।
· NICRA के अंतर्गत जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल के प्रोटोकॉल के अनुसार 651 कृषि जिलों में संवेदनशीलता आकलन किया गया। इनमें से 310 जिलों को अत्यधिक या बहुत अधिक संवेदनशील पाया गया। इसके बाद जिला कृषि आकस्मिकता योजनाएँ तैयार की गईं, जिनमें क्षेत्र-विशिष्ट जलवायु अनुकूल फसलें एवं प्रबंधन पद्धतियाँ शामिल हैं।
· किसानों की लचीलापन क्षमता को और मजबूत करने के लिए 28 राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों के 151 संवेदनशील जिलों के 448 गांवों में “जलवायु अनुकूल गांव” स्थापित किए गए हैं, जहाँ उपयुक्त तकनीकों का प्रदर्शन किया जा रहा है ताकि उनका व्यापक स्तर पर विस्तार किया जा सके।
· इसके अतिरिक्त, ICAR के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान प्रणाली के अंतर्गत वर्ष 2014-2025 के दौरान 2,996 जलवायु अनुकूल फसल किस्में जारी की गईं। साथ ही, प्रत्यक्ष बुवाई धान, जीरो-टिल गेहूं, तनाव-सहनशील फसलें तथा फसल अवशेष प्रबंधन जैसी पूरक कृषि पद्धतियों का भी विकास एवं प्रसार किया गया है, ताकि जलवायु संबंधी जोखिमों को कम किया जा सके और कृषि की स्थिरता को बढ़ाया जा सके।
एनएमएसए हस्तक्षेपों के माध्यम से खाद्य-जलवायु-जल संबंध का समाधान
· राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन संयुक्त राष्ट्र के वर्ष 2030 के सतत विकास लक्ष्यों (SDGs), विशेषकर SDG 2 (भुखमरी समाप्ति), SDG 6 (स्वच्छ जल एवं स्वच्छता) तथा SDG 13 (जलवायु कार्रवाई) का समर्थन करता है।
SDG 2 के अंतर्गत
· NMSA वर्षा आधारित क्षेत्र विकास (RAD) के माध्यम से सतत खाद्य उत्पादन को बढ़ावा देता है। यह एकीकृत कृषि प्रणाली (IFS) को समर्थन देकर उत्पादकता बढ़ाने एवं किसानों की आय को स्थिर बनाने में सहायता करता है। मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन (SHM) घटक संतुलित पोषक तत्व उपयोग एवं दीर्घकालिक मृदा उर्वरता बनाए रखने को प्रोत्साहित करता है, जिससे खाद्य सुरक्षा मजबूत होती है।
SDG 6 के अनुरूप
· “पर ड्रॉप मोर क्रॉप” घटक सूक्ष्म सिंचाई, सटीक जल उपयोग तथा मृदा नमी संरक्षण के माध्यम से जल उपयोग दक्षता में सुधार करता है, जिससे कृषि में सतत जल प्रबंधन को बढ़ावा मिलता है।
SDG 13 के संदर्भ में
· राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन जलवायु अनुकूल फसल प्रणालियों, प्राकृतिक संसाधन संरक्षण एवं जोखिम न्यूनीकरण रणनीतियों को प्रोत्साहित करता है, जिससे किसानों को सूखा, बाढ़ और अन्य जलवायु संबंधी तनावों से निपटने में सहायता मिलती है।
· इन प्रयासों के माध्यम से NMSA सतत कृषि, जल के कुशल उपयोग तथा जलवायु लचीलापन को SDG ढांचे के अनुरूप आगे बढ़ा रहा है।
निष्कर्ष
· राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन जल उपयोग दक्षता, मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन तथा जलवायु अनुकूल कृषि प्रणालियों को एकीकृत कर सतत एवं जलवायु-लचीले कृषि विकास के लिए एक समेकित दृष्टिकोण प्रदान करता है।
· वर्षा आधारित क्षेत्र विकास, पर ड्रॉप मोर क्रॉ तथा मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन जैसे लक्षित हस्तक्षेपों के माध्यम से यह मिशन सतत कृषि उत्पादन और प्राकृतिक संसाधनों के कुशल उपयोग को बढ़ावा देता है।
(Input from PIB)
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