नई दिल्लीः भारत ने मंगलवार को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में लंबे समय से लंबित सुधारों में हो रही देरी पर चिंता जताते हुए कहा कि संयुक्त राष्ट्र की विश्वसनीयता पर संकट गहराता जा रहा है, क्योंकि इसकी संरचना अब भी वर्ष 1945 की भू-राजनीतिक परिस्थितियों पर आधारित है।
UN में “यूएन चार्टर के उद्देश्यों और सिद्धांतों को बनाए रखने तथा संयुक्त राष्ट्र केन्द्रित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को मजबूत करने” विषय पर आयोजित खुली बहस में भारत के स्थायी प्रतिनिधि पार्वथनेनी हरीश ने कहा कि सुधारों की दिशा में प्रगति “जमे हुए हितों” के कारण बाधित हो रही है, जो वर्तमान व्यवस्था को बनाए रखना चाहते हैं।
उन्होंने कहा, “सुरक्षा परिषद सुधारों पर अंतर-सरकारी वार्ताओं (IGN) में प्रगति का अभाव इस बात का संकेत है कि कई सदस्य देश आठ दशक पुरानी UNSC संरचना को बनाए रखना चाहते हैं।”
भारत लंबे समय से UNSC में स्थायी सदस्यता के विस्तार की मांग करता रहा है। भारत का कहना है कि वर्तमान संरचना आज की वैश्विक वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित नहीं करती। हरीश ने कहा कि सार्थक सुधार तभी संभव है जब स्थायी सदस्यता श्रेणी का विस्तार किया जाए, क्योंकि इससे परिषद की निर्णय प्रक्रिया में वास्तविक बदलाव आएगा।
उन्होंने कहा, “UNSC एक जीवंत संस्था होनी चाहिए, कोई जीवाश्म नहीं।” उन्होंने चेतावनी दी कि यदि परिषद समय के अनुसार नहीं बदली, तो उसकी वैधता, प्रभावशीलता और अधिकार और कमजोर होंगे।
हालांकि उन्होंने किसी देश का नाम नहीं लिया, लेकिन भारत की टिप्पणी को “यूनाइटिंग फॉर कंसेंसस” समूह की ओर इशारा माना गया, जो नए स्थायी सदस्यों के गठन का विरोध करता रहा है और जिस पर सुधार प्रक्रिया को टालने के आरोप लगते रहे हैं।
UN महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने भी सुधारों की तत्काल आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि वैश्विक संस्थाओं को आज की वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित करना चाहिए, न कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की विश्व व्यवस्था को।
उन्होंने कहा, “ऐसी सुरक्षा परिषद, जो आज की भू-राजनीतिक वास्तविकताओं को नहीं दर्शाती, अपनी जिम्मेदारियों को पूरी तरह निभाने में सक्षम नहीं हो सकती।” उन्होंने विशेष रूप से अफ्रीका को स्थायी सदस्यता से बाहर रखने को “ऐतिहासिक अन्याय” बताया।
संयुक्त राष्ट्र की पुरानी संरचना को समझाने के लिए हरीश ने एक तीखी तुलना करते हुए कहा कि आज के दौर में संयुक्त राष्ट्र उसी तरह काम कर रहा है जैसे आधुनिक एआई तकनीकों को 1945 के कंप्यूटर ENIAC पर चलाने की कोशिश की जाए।
उन्होंने कहा कि इतिहास में अस्तित्व एवं प्रगति के लिए बदलाव आवश्यक रहा है और संयुक्त राष्ट्र भी बदलती वैश्विक परिस्थितियों से अलग नहीं रह सकता।
सुधारित सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता के पक्ष में हरीश ने द्वितीय विश्व युद्ध तथा उसके बाद भारत के योगदान का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि 25 लाख से अधिक भारतीय सैनिक मित्र राष्ट्रों की ओर से युद्ध में लड़े और 87 हजार से अधिक सैनिकों ने अपने प्राण न्योछावर किए।
उन्होंने कहा, “यह हमारा युद्ध नहीं था, फिर भी हमने इसकी भारी कीमत चुकाई। इसलिए UN के संस्थापक सदस्य के रूप में भारत की भूमिका स्वाभाविक थी।”
हरीश ने कोरिया, इंडोचाइना, कांगो और गाजा जैसे क्षेत्रों में UN शांति अभियानों में भारत के योगदान का भी उल्लेख किया।
भारतीय प्रतिनिधि ने सुरक्षा परिषद के स्थायी वीटो शक्तियों वाले सदस्यों के बीच बढ़ते मतभेदों पर भी चिंता जताई और कहा कि इससे वैश्विक संकटों से निपटने में परिषद की प्रभावशीलता कमजोर हुई है।
गुटेरेस ने भी इस चिंता से सहमति जताते हुए कहा कि UNSC अक्सर एकजुटता और उद्देश्य के साथ कार्य करने में विफल रहती है और इसका असर केवल संयुक्त राष्ट्र तक सीमित नहीं रहता।
बहस के बाद सोशल मीडिया मंच X पर एक पोस्ट में हरीश ने बहुपक्षवाद के प्रति भारत की प्रतिबद्धता दोहराई और संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) को मजबूत बनाने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने सुरक्षा परिषद में अधिक पारदर्शिता और वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों के अनुरूप सुधारों की आवश्यकता पर भी जोर दिया।
हरीश ने पाकिस्तान की भी आलोचना करते हुए उस पर भारत के खिलाफ सीमा पार आतंकवाद को राज्य नीति के रूप में इस्तेमाल करने का आरोप लगाया।
उन्होंने कहा, “पाकिस्तान को यह स्वीकार करना होगा कि सीमा पार आतंकवाद को प्रायोजित करने के परिणाम होते हैं।” उन्होंने कहा कि भारत को ऐसे खतरों से अपनी रक्षा करने का पूरा अधिकार है।
(Input from DD News)
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