नई दिल्लीः 1982 में आईटीआई (अंतरराष्ट्रीय रंगमंच संस्थान) की डांस कमेटी ने अंतरराष्ट्रीय नृत्य दिवस की स्थापना की, जिसे हर वर्ष 29 अप्रैल को आधुनिक बैले के जनक जीन-जॉर्ज नोवेर्रे (1727–1810) के जन्मदिवस पर मनाया जाता है। यह दिवस नृत्य के कलात्मक, सांस्कृतिक और सामाजिक महत्व को रेखांकित करता है तथा सभी आयु वर्ग और पृष्ठभूमि के लोगों को इसमें भाग लेने के लिए प्रेरित करता है। नृत्य केवल एक कला नहीं है, बल्कि सांस्कृतिक अभिव्यक्ति तथा संवाद का एक सशक्त माध्यम भी है, जिसे दुनिया भर में करोड़ों लोग अपनाते हैं।
नृत्य सदियों से समारोहों, अनुष्ठानों, उत्सवों एवं मनोरंजन का अभिन्न हिस्सा रहा है। यह सामाजिक मेलजोल का एक प्रभावशाली माध्यम रहा है, जिसने सहयोग और एकता की भावना को मजबूत किया जो मानव समुदायों के अस्तित्व के लिए अत्यंत आवश्यक भी था।
कलात्मक आकर्षण के अलावा नृत्य स्वास्थ्य के लिए भी बहुत लाभकारी है। केवल 30 मिनट का नृत्य एक जॉगिंग सत्र जितना प्रभावी हो सकता है। यह व्यायाम का आनंददायक और रोचक तरीका है, जिसमें भारी उपकरणों या कठिन दिनचर्या की आवश्यकता नहीं होती।
इसके अलावा, नृत्य मानसिक स्वास्थ्य को भी बेहतर बनाता है, तनाव कम करने और मन को शांत रखने में मदद करता है।
International Dance Day 2026: थीम
हालांकि आधिकारिक वैश्विक थीम हर वर्ष अलग हो सकती है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय नृत्य दिवस 2026 समावेशिता, सांस्कृतिक आदान-प्रदान तथा नृत्य की रचनात्मकता व स्वास्थ्यवर्धक भूमिका पर जोर देता है। इसका मुख्य उद्देश्य बिना किसी विशिष्टता के नृत्य को सभी के लिए सुलभ बनाना है।
International Dance Day 2026: भारतीय नृत्य परंपरा
भारत की नृत्य परंपरा अत्यंत समृद्ध है, जिसकी जड़ें नाट्यशास्त्र में निहित हैं। भारत में 8–9 मान्यता प्राप्त शास्त्रीय नृत्य शैलियाँ हैं। प्रमुख शैलियों में भरतनाट्यम, कथक, कथकली, मोहिनीअट्टम, कुचिपुड़ी, ओडिसी, मणिपुरी और सत्त्रिया शामिल हैं, साथ ही अनेक जीवंत लोक नृत्य भी प्रचलित हैं।
भरतनाट्यम
भरतनाट्यम तमिलनाडु का प्रमुख शास्त्रीय नृत्य है, जिसका इतिहास 500 ईसा पूर्व से 500 ईस्वी तक माना जाता है। इसका उल्लेख शिलप्पतिकारम में भी मिलता है। इसकी विशेषताएँ हैं—स्थिर धड़, मुड़े हुए घुटने (अरमंडी), जटिल पद संचालन और भावपूर्ण मुद्राएँ। विभिन्न बानी (शैलियाँ) अलग-अलग गुरुओं और विद्यालयों का प्रतिनिधित्व करती हैं। प्रस्तुति का संचालन नट्टुवनार करते हैं, जिसमें संगीत और कथा का सुंदर समन्वय होता है।
कथक
कथक उत्तर भारत का प्रमुख शास्त्रीय नृत्य है, जिसका विकास कथाकारों से हुआ, जो रामायण और महाभारत की कथा सुनाते थे। इसमें तेज घूमर, जटिल पद संचालन और प्रभावशाली अभिनय का संगम होता है। इसकी पहचान सीधी मुद्रा और लयबद्ध सटीकता से होती है। प्रस्तुतियों में ठाठ, आमद, तोड़े, परहंत, तत्कार और गत निकास जैसे भाग शामिल होते हैं।
कथकली
कथकली केरल का 17वीं शताब्दी का नृत्य-नाटक है, जो भव्य मेकअप (वेषम) और आकर्षक वेशभूषा के लिए प्रसिद्ध है। इसमें पौराणिक कथाओं को शक्तिशाली चेहरे के भावों, हस्त मुद्राओं और लयबद्ध गतियों के माध्यम से बिना संवाद के प्रस्तुत किया जाता है।
मोहिनीअट्टम
मोहिनीअट्टम भी केरल की शास्त्रीय नृत्य शैली है। इसका नाम भगवान विष्णु के मोहक अवतार मोहिनी पर आधारित है। यह नाट्यशास्त्र पर आधारित है और कोमल लास्य शैली का अनुसरण करती है। परंपरागत रूप से इसे महिलाएँ प्रस्तुत करती थीं, हालांकि अब पुरुष भी इसका प्रदर्शन करते हैं।
कुचिपुड़ी
कुचिपुड़ी आंध्र प्रदेश की नृत्य-नाटिका शैली है, जिसे 17वीं शताब्दी में सिद्धेंद्र योगी ने व्यवस्थित रूप दिया। यह कृष्ण भक्ति से जुड़ी है और संगीत, भावपूर्ण नृत्य तथा कथा-वाचन का सुंदर मिश्रण है। इसकी शुरुआत प्रायः मंगलाचरण से होती है।
ओडिसी
भारत के सबसे प्राचीन शास्त्रीय नृत्यों में से एक ओडिसी, ओडिशा के मंदिरों से उत्पन्न हुआ। इसमें विशेष रूप से वैष्णव भक्ति विषयों को कोमल गतियों और मुद्राओं के माध्यम से व्यक्त किया जाता है। इसका विकास दो परंपराओं में हुआ—मंदिरों की महारी परंपरा और बालकों द्वारा प्रस्तुत गोटीपुआ शैली।
मणिपुरी
मणिपुरी, जिसे रास लीला भी कहा जाता है, मणिपुर की प्रमुख नृत्य शैली है। यह लाई हराओबा और पुंग चोलोम जैसी परंपराओं से प्रेरित है। राजा चिंग थांग खोम्बा से जुड़ी यह शैली राधा-कृष्ण भक्ति को कोमल, प्रवाहपूर्ण गतियों और शांत भावों के माध्यम से प्रस्तुत करती है।
सत्त्रिया
सत्त्रिया असम की शास्त्रीय नृत्य शैली है, जिसकी स्थापना श्रीमंत शंकरदेव और माधवदेव ने की। इसका उद्भव मठों (सत्रों) में हुआ और इसमें नृत्त, नृत्य और नाट्य का सुंदर समन्वय है। इसके माध्यम से भगवान कृष्ण की भक्तिमय कथाएं लय और भाव के साथ प्रस्तुत की जाती हैं।
नृत्य अभिव्यक्ति, संवाद और जुड़ाव का एक सशक्त माध्यम है। शैक्षणिक संस्थानों में यह विद्यार्थियों में आत्मविश्वास, अनुशासन और रचनात्मकता विकसित करता है। व्यापक स्तर पर यह दिवस विविधता का उत्सव मनाने, विभिन्न परंपराओं की सराहना करने और साझा कलात्मक अनुभवों के माध्यम से एकता को बढ़ावा देने का संदेश देता है।
(Input from Agency)
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