Central Government द्वारा वर्ष 2025-26 से 2030-31 तक “National Mission on Edible OIL” योजना लागू की गई है, जिसके तहत 11,440 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है।
कटिहार: दूर-दूर तक फैले पीले फूलों के खेत कभी किसानों की समृद्धि की पहचान हुआ करते थे, खासकर सीमांचल और कोसी क्षेत्र के सीमावर्ती इलाकों में, जहां सूरजमुखी की खेती एक प्रमुख पहचान रही है। लेकिन हाल के वर्षों में किसानों का रुख मक्का, गेहूं और अन्य नकदी फसलों की ओर बढ़ने से सूरजमुखी जैसी तिलहनी फसलों का रकबा घटा है। ऐसे में सरकार एक बार फिर सूरजमुखी की खेती को प्रोत्साहित करने के लिए सक्रिय हो गई है।
KVK (कृषि विज्ञान केन्द्र) तथा कृषि विभाग द्वारा तिलहन फसलों को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न योजनाएं चलाई जा रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि मिट्टी की उर्वरा शक्ति को बनाए रखने के लिए फसल चक्र अपनाना बेहद जरूरी है, जिसमें दलहन और तिलहन फसलों का समावेश महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। सरकार का उद्देश्य है कि किसान सभी फसल क्षेत्रों में आत्मनिर्भर बनें।
Central Government द्वारा वर्ष 2025-26 से 2030-31 तक “National Mission on Edible OIL” योजना लागू की गई है, जिसके तहत 11,440 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। वर्तमान में देश में 39.6 मिलियन टन तिलहन का उत्पादन हो रहा है, जिसे अगले पांच वर्षों में बढ़ाकर 70.3 मिलियन टन करने का लक्ष्य रखा गया है।
ICAR के प्रधान वैज्ञानिक, डॉ. डी.बी. सिंह ने बताया कि इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए पूरे देश में प्रयास किए जा रहे हैं। बिहार में वर्ष 2025-26 के दौरान 44 विभिन्न KVK के माध्यम से 7000 हैक्टर से अधिक भूमि पर तिलहनी फसलों का प्रत्यक्षण कार्यक्रम चलाया गया, जिसमें सूरजमुखी को भी एक महत्वपूर्ण फसल के रूप में शामिल किया गया है। उन्होंने कहा कि तिलहन में सरसों प्रमुख फसल है, लेकिन सूरजमुखी से दूर हो रहे किसानों को फिर से जोड़ने के प्रयास जारी हैं।
कटिहार के जिला कृषि पदाधिकारी मिथिलेश कुमार ने बताया कि सरकार का मुख्य फोकस दलहन और तिलहन फसलों पर है। रबी, खरीफ और गरमा फसल चक्र में ऐसे फसलों के चयन पर जोर दिया जा रहा है, जो तिलहन उत्पादन के लिए लाभकारी हों।
वहीं गरमा फसल के रूप में सूरजमुखी की खेती को बढ़ावा देने के लिए इच्छुक किसानों को मुफ्त बीज उपलब्ध कराए जा रहे हैं। इसके साथ ही एक एकड़ खेती के लिए व्यक्तिगत किसानों को और 25 एकड़ के क्लस्टर में खेती करने वाले किसान समूहों को बीज एवं अन्य कृषि इनपुट जैसे जैव उर्वरक और जैव कीटनाशी भी दिए जा रहे हैं, ताकि फसल को रोग और कीटों से बचाया जा सके और उत्पादन बेहतर हो।
अधिकारियों के अनुसार, सीमांचल क्षेत्र में वर्तमान समय में मक्का मुख्य फसल बन चुकी है, जिससे किसान तिलहनी फसलों से दूर होते जा रहे हैं। ऐसे में कृषि विभाग फसल चक्र अपनाने और मिट्टी की उर्वरा शक्ति को बनाए रखने के लिए लगातार जागरूकता और प्रोत्साहन कार्यक्रम चला रहा है।
(Input from PBShabd)
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