नई दिल्ली । India ने विश्व व्यापार संगठन (WTO) के मत्स्य पालन सब्सिडी समझौते (Agreement on Fisheries Subsidies) को औपचारिक रूप से स्वीकार करते हुए अपना स्वीकृति-पत्र (Instrument of Acceptance) WTO के पास जमा कर दिया है। इसके साथ ही भारत ने सतत मत्स्य प्रबंधन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है, साथ ही पारंपरिक और लघु स्तर के मछुआरा समुदायों के हितों की रक्षा करने पर भी बल दिया है।
स्वीकृति-पत्र सोमवार को वाणिज्य सचिव द्वारा डब्ल्यूटीओ की महानिदेशक को सौंपा गया, जिससे भारत इस समझौते में शामिल होने वाला डब्ल्यूटीओ का 123वाँ सदस्य बन गया।
यह समझौता जून 2022 में जिनेवा में आयोजित WTO के 12वें मंत्रिस्तरीय सम्मेलन के दौरान सर्वसम्मति से अपनाया गया था। मत्स्य पालन सब्सिडी समझौता पर्यावरणीय सततता के उद्देश्य वाला WTO का पहला बहुपक्षीय समझौता है। डब्ल्यूटीओ के दो-तिहाई सदस्यों द्वारा इसे स्वीकार किए जाने के बाद यह 15 सितंबर, 2025 से प्रभाव में आया।
यह समझौता समुद्री जंगली मत्स्य दोहन (Marine Wild Capture Fishing) और समुद्र में मत्स्य संबंधी गतिविधियों से जुड़ी सब्सिडियों को लक्षित करता है, जबकि जलीय कृषि (Aquaculture) और अंतर्देशीय मत्स्य पालन (Inland Fisheries) को इसके दायरे से स्पष्ट रूप से बाहर रखा गया है। इसका अर्थ है कि भारत का जलीय कृषि क्षेत्र, जिसमें झींगा (श्रिम्प) का निर्यात भी शामिल है, नए नियमों से प्रभावित नहीं होगा।
वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के अनुसार, इस समझौते का उद्देश्य अवैध, अप्रतिवेदित और अनियमित (आईयूयू) मत्स्य पालन तथा अत्यधिक दोहन किए गए मत्स्य भंडारों के शिकार को बढ़ावा देने वाली सब्सिडियों पर रोक लगाना है, जिससे समुद्री संसाधनों के संरक्षण और उनके सतत उपयोग को बढ़ावा मिलेगा।
मंत्रालय ने कहा कि यह समझौता अस्थिर मत्स्य पालन की प्रवृत्तियों को हतोत्साहित कर पारंपरिक और लघु स्तर के मछुआरों की आजीविका की रक्षा करने में मदद करेगा तथा वैश्विक मत्स्य व्यवस्था को अधिक संतुलित बनाएगा। यह समझौता दूरस्थ समुद्री क्षेत्रों में संचालित बड़े औद्योगिक मत्स्य बेड़ों को मिलने वाली हानिकारक सब्सिडियों पर भी अनुशासन लागू करता है, जिससे भारत जैसे देशों को लाभ मिलने की उम्मीद है, जहाँ मत्स्य क्षेत्र मुख्य रूप से छोटे स्तर के संचालकों पर आधारित है।
मंत्रालय ने कहा कि इस समझौते में भारत की भागीदारी से एक जिम्मेदार समुद्री खाद्य निर्यातक के रूप में उसकी प्रतिष्ठा और मजबूत होगी तथा उन अंतरराष्ट्रीय प्रीमियम बाजारों तक उसकी पहुँच बेहतर होगी, जहाँ सततता और अनुरेखण (Traceability) को बढ़ती प्राथमिकता दी जा रही है। चूँकि भारत का समुद्री खाद्य निर्यात मुख्य रूप से जलीय कृषि आधारित झींगा उत्पादन पर निर्भर है, जो इस समझौते के दायरे से बाहर है, इसलिए देश की निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता पर इसका कोई प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की संभावना नहीं है।
मंत्रालय ने यह भी रेखांकित किया कि भारत का वर्तमान मत्स्य प्रबंधन ढाँचा पहले से ही इस समझौते के उद्देश्यों के अनुरूप है। विशेष आर्थिक क्षेत्र (EEZ) में मत्स्य संसाधनों के सतत दोहन नियम, 2025, भारतीय ध्वज वाले मत्स्य पोतों द्वारा उच्च समुद्री क्षेत्रों में सतत मत्स्य दोहन संबंधी दिशा-निर्देश, 2025 तथा प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (पीएमएमएसवाई) के तहत क्षमता निर्माण की पहलें इस समझौते के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए मजबूत नियामक और संस्थागत आधार प्रदान करती हैं।
मंत्रालय ने कहा कि ये उपाय पारंपरिक और लघु स्तर के मछुआरों के लिए पर्याप्त नीतिगत अवसर सुरक्षित रखते हुए समुद्री संरक्षण और संसाधनों के सतत प्रबंधन को भी समर्थन प्रदान करते हैं।
इस समझौते को औपचारिक रूप से स्वीकार करके भारत ने सतत मत्स्य पालन, जिम्मेदार समुद्री प्रशासन तथा डब्ल्यूटीओ को केन्द्र में रखते हुए नियम-आधारित बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को पुनः दोहराया है।
(Input from DD News)
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