Traditional folk songs and folk Dances । Department of Arts and Culture: लोकनृत्य को संवारने की पहल, पूर्णिया में 15 दिवसीय निःशुल्क कार्यशाला शुरू

Traditional folk songs and folk Dances । Department of Arts and Culture: लोकनृत्य को संवारने की पहल, पूर्णिया में 15 दिवसीय निःशुल्क कार्यशाला शुरू

जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी पंकज पटेल ने बताया कि आधुनिकता के बढ़ते प्रभाव के बीच विलुप्त होती लोक कलाओं को संरक्षित करने के उद्देश्य से यह पहल की गई है। 

पूर्णिया, बिहार । बदलते समय के साथ आधुनिक मनोरंजन की चकाचौंध में गांव-घर के लोकगीत और लोकनृत्य धीरे-धीरे पीछे छूटते जा रहे हैं। ऐसे दौर में पूर्णिया में अपनी मिट्टी की आवाज और लोक संस्कृति को बचाने की खूबसूरत पहल शुरू की गई है। लोकगीत और लोकनृत्य की परंपरा को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के उद्देश्य से Department of Arts and Culture की ओर से 15 दिवसीय नि:शुल्क लोकगीत एवं लोकनृत्य प्रशिक्षण कार्यशाला का शुभारंभ पूर्णिया के आर्ट गैलरी में किया गया।

जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी पंकज पटेल ने बताया कि आधुनिकता के बढ़ते प्रभाव के बीच विलुप्त होती लोक कलाओं को संरक्षित करने के उद्देश्य से यह पहल की गई है। इस कार्यशाला के माध्यम से युवाओं को पारंपरिक लोकगीत एवं लोकनृत्य का प्रशिक्षण दिया जा रहा है।

सीमांचल की लोक संस्कृति बेहद समृद्ध रही है। लोकगीत और लोकनृत्य यहां की सांस्कृतिक पहचान के अभिन्न अंग हैं। हालांकि, बदलती जीवनशैली और आधुनिकता के प्रभाव के कारण कई पारंपरिक लोक विधाएं धीरे-धीरे विलुप्ति की ओर बढ़ रही हैं। ऐसे में कला एवं संस्कृति विभाग की यह पहल महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

कार्यशाला में कुशल प्रशिक्षकों द्वारा युवाओं को Traditional folk songs and folk Dances की बारीकियां सिखाई जा रही हैं। कहीं तबले की थाप पर सोहर और अन्य लोकगीतों का प्रशिक्षण दिया जा रहा है, तो वहीं घुंघरुओं की झंकार के बीच लोक नृत्य की विभिन्न शैलियों का अभ्यास कराया जा रहा है। जिले के कई प्रतिभावान और सम्मानित कलाकार प्रशिक्षण दे रहे हैं।

प्रशिक्षण देने वाले कलाकार भी इस पहल से उत्साहित हैं। उनका कहना है कि नई पीढ़ी को अपनी लोक संस्कृति और परंपराओं से जोड़ने के लिए इस तरह के आयोजन बेहद जरूरी हैं। उन्होंने Department of Arts and Culture की इस पहल की सराहना की।

पूर्णिया में लोकगीत और लोकनृत्य के संरक्षण की यह मुहिम आने वाले समय में नई ऊंचाई हासिल कर सकती है। उम्मीद है कि मिट्टी की खुशबू से जुड़ी लोकधुनें और पारंपरिक नृत्य की विरासत अगली पीढ़ी तक पहुंचेंगी। यह महज कला सीखने की कार्यशाला नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक पहचान से जुड़ने की पाठशाला है। पूर्णिया में शुरू हुई यह पहल इसी संदेश को मजबूती दे रही है।

(Input from News on Air)

 

 

Sanjay Sharan

Sanjay Sharan

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