नई दिल्ली । भारत ने भूमि बहाली में सहायता और सूखे के प्रति लचीलापन मजबूत करने के लिए विविधीकृत, पर्याप्त, पूर्वानुमेय और सतत अंतरराष्ट्रीय वित्त पोषण की आवश्यकता पर जोर दिया है।
Union Environment, Forest and Climate Change Minister भूपेंद्र यादव ने मंगोलिया के उलानबटोर में मरुस्थलीकरण से निपटने के लिए संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (UNCCD) के पक्षकारों के सम्मेलन (COP17) के 17वें सत्र के दौरान “स्वस्थ भूमि और सूखा लचीलेपन के लिए अभिनव वित्तीय तंत्र” विषय पर आयोजित मंत्रिस्तरीय संवाद को संबोधित करते हुए यह बात कही।
मंत्री ने भूमि बहाली और सूखा लचीलेपन के लिए भारत की अभिनव और विविधीकृत वित्तपोषण संरचना पर प्रकाश डाला। श्री यादव ने भूमि बहाली में सतत निवेश की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि भूमि बहाली कोई लागत नहीं, बल्कि खाद्य, जल, जैव विविधता, आजीविका और दीर्घकालिक लचीलेपन में निवेश है।
उन्होंने जोर दिया कि बड़े पैमाने पर मरुस्थलीकरण, भूमि क्षरण और सूखे से निपटने के लिए सार्वजनिक बजट से आगे बढ़कर वित्त के विविधीकृत, पूर्वानुमेय और सतत स्रोतों की आवश्यकता है, साथ ही सार्वजनिक-निजी भागीदारी को भी मजबूत करना होगा।
मंत्री ने भारत के मिश्रित हरित-वित्त ढांचे पर प्रकाश डाला, जो जलवायु परिवर्तन अनुकूलन, सतत भूमि उपयोग, वानिकी और कृषि, वनीकरण तथा जैव विविधता संरक्षण के लिए वित्तपोषण को सक्षम बनाता है।
उन्होंने भूमि बहाली, सूखा लचीलापन, सतत वानिकी तथा अन्य पर्यावरणीय और जलवायु प्राथमिकताओं के लिए पूंजी जुटाने के एक माध्यम के रूप में सॉवरेन ग्रीन बॉन्ड्स पर भी प्रकाश डाला। श्री यादव ने भारत के ग्रीन क्रेडिट कार्यक्रम को भी रेखांकित किया, जो सार्वजनिक और निजी संस्थाओं को क्षरित वन भूमि की बहाली के लिए वित्तपोषण करने में सक्षम बनाता है।
क्रेडिट पांच वर्षों की बहाली के बाद और कम से कम 40 फीसदी छत्र घनत्व प्राप्त होने पर जारी किए जाते हैं, तथा इनका उपयोग प्रतिपूरक वनीकरण, वैधानिक वृक्षारोपण या कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR) संबंधी दायित्वों के लिए एक बार किया जा सकता है।
उन्होंने भारत की प्रतिपूरक संरक्षण व्यवस्था पर भी प्रकाश डाला, जिसके तहत वन भूमि के डायवर्जन के लिए प्राप्त भुगतानों को प्रतिपूरक वनीकरण और पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली की दिशा में लगाया जाता है, जबकि कॉरपोरेट वित्तपोषण को पर्यावरणीय नियामक प्रक्रियाओं में एकीकृत किया जाता है।
अभिसरण के महत्व को रेखांकित करते हुए मंत्री ने कहा कि Green Credit Programme और प्रतिपूरक वनीकरण निधि जैसे तंत्रों के माध्यम से सार्वजनिक और निजी वित्त को एक ही भू-दृश्य पर तथा नागरिकों की भागीदारी के साथ एकजुट करना, संपूर्ण-सरकार (Whole-of-Government) और संपूर्ण-समाज (Whole-of-Society) दृष्टिकोण का प्रतिनिधित्व करता है।
उन्होंने जोर दिया कि वित्तपोषण निरंतर, सत्यापन योग्य और स्थानीय समुदायों से जुड़ा होना चाहिए। उन्होंने कहा कि भारत का अनुभव दर्शाता है कि प्रतिबद्ध घरेलू संसाधन क्या हासिल कर सकते हैं, लेकिन उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह भूमि बहाली और सूखा लचीलेपन के लिए अतिरिक्त, पर्याप्त और पूर्वानुमेय अंतरराष्ट्रीय वित्त का विकल्प नहीं हो सकता।
अपने संबोधन के समापन में मंत्री ने अनुभव, सुरक्षा उपायों, संस्थागत व्यवस्थाओं, सीखे गए सबक और उन क्षेत्रों को साझा करने के लिए भारत की प्रतिबद्धता दोहराई, जहां सुधारात्मक कदम उठाने की आवश्यकता है।
(Input from News on Air)
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